आज है देश के 8वें पीएम चंद्रशेखर सिंह की पुण्यतिथि

युवा तुर्क को खोने पर रो रहा बलिया, खल रही कमी

पूर्व पीएम चंद्रशेखर सिंह के 14वीं पुण्यतिथि पर विशेष
बलियाः देश के 8वें प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सिंह की आज 14वीं पुण्यतिथि है। वे बलिया जनपद के इब्राहीमपट्टी गांव के मूल निवासी थे। जिनके खोने के गम आज पूरा बलियावासी रो रहे है। बिना किसी राज्यमंत्री या केंद्र में मंत्री बने बगैर ही सीधे पीएम बनने वाले चंद्रशेखर सिंह को पूरा देश युवा तुर्क के रुप में जानता है और उनके स्पष्ट और तीखे तेवर के कारण उनकी कमी आज पूरे देश में खल रही है। बलिया की धरती तो अपने इस बेटे के गम आज भी वैसा ही पिछड़ा है, जैसा उनके प्रधानमंत्रीत्व काल में रहा है।

भारतीय राजनीति के वजीर नहीं, शहंशाह थे चंद्रशेखर
– किसान परिवार में बलिया जनपद के इब्राहीमपट्टी में जन्मे चंद्रशेखर देश के एकलौते ऐसे पीएम रहे है जिनके पास प्रधानमंत्री पद से पहले केंद्र या राज्य में किसी मंत्री पद तक का अनुभव नहीं था। वे भारतीय राजनीति में किसी का वजीर बनकर नहीं रहे और सीधे देश शहंशाह यानि पीएम की कुर्सी पर विराजमान हुए।

धरती नाप राष्ट्रसपूत बन गए बलिया के चंद्रशेखर
– क्रांतिकारी जोश के साथ समाजवादी विचारधारा संग देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा गजब का था। यही कारण रहा कि देश के लोगों के दर्द को करीब से जानने के लिए वे 1983 में देश की यात्रा को पैदल ही निकल गए और दक्षिण में कन्याकुमारी से नई दिल्ली राजघाट तक लगभग 4,260 किलोमीटर की मैराथन पदयात्रा महज लगभग छ माह में पूरा कर डाला। उन दिनों केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा सहित देश के विभिन्न प्रांतों में लगभग 15 भारत यात्रा केंद्रों की स्थापना की गई। इस यात्रा की उन दिनों में खुब चर्चा भी हुई। पदयात्रा के दौरान वे हर प्रांत व क्षेत्र में क्षेत्रीय स्तर पर लोगों के अलग-अलग समस्याओं से रुबरु हुए। कन्याकुमारी से नई दिल्ली को पैदल नापने वाले एकलौते पीएम भी कहे जाते है।
सोशलिस्ट पार्टी से शुरू की राजनीतिक पारी
– अपनी राजनीतिक पारी सोशलिस्ट पार्टी से शुरू की और बाद में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी व प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ने व छुटने के बाद कांग्रेस में भी शामिल हुए। किंतु अपनी समाजवादी छवि को नुकसान पहुंचने का आभास होने पर स्वयं के वजूद की रक्षा को वे जनता पार्टी, जनता दल, समाजवादी जनता दल तक का सफर कर लिया। बाद उन्होंने समाजवादी जनता पार्टी नामक अपनी पार्टी का गठन किया। 1962 में वे यूपी से राज्यसभा सदस्य चुने गए और यही इनके संसदीय जीवन की शुरुआत थी। जिसके बाद 1977 से वे लगातार आठ बार बलिया संसदीय सीट से सांसद रहे। इसमें 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के कारण उपजे विवाद में 1984 का चुनाव वे हार गए थे। इस बीच 1967 में कांग्रेस संसदीय दल के महासचिव बनने के बाद उन्होंने सामाजिक बदलाव लाने वाली नीतियों पर ज्यादा जोर दिया और उच्च वर्गों के बढ़ते एकाधिकार के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई। जिसके कारण तत्कालीन सत्ताधारी दिग्गजों से उनके खुलकर मतभेद हो गए। बावजूद अपने नीतियों पर अड़े बलिया के चंद्रशेखर को युवा तुर्क की उपाधी दी गई। 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विरोध के बावजूद कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति का चुनाव भी लड़े और जीत गए। जिसके बाद उनके जीवट का पूरे देश ने लोहा माना। कांग्रेस का खुलकर विरोध करने के कारण 1975 में उन्हें अनेक राजनीतिक उत्पीड़न भी झेलने पड़े किंतु वे अपने इरादों व नीतियों से तनिक भी नहीं डगमगाएं। 10 नवंबर, 1990 से 21 जून 1991 तक उन्होंने देश के प्रधानमंत्री पद का कार्यभार संभाला। कैंसर की गंभीर बीमारी के कारण 8 जुलाई 2009 को उनका निधन हो गया। अंत समय तक बलियावासियों के लिए उनके आंखों में भरपूर प्यार था। यही कारण रहा कि 2009 में ही बलिया में अपने अंतिम कार्यक्रम के दौरान हजारों लोगों के बीच में उनकी आंखे छलछला गई।

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