यूं ही नहीं बलिया कहलाता अलग राष्ट्र, देश से पांच वर्ष पहले बलिया हुआ था आजाद

चरौवां (बिल्थरारोड) बलिदान दिवस पर विशेष-क्रांतिवीर सपूतों ने अंग्रेजों संग खून की होली खेल चरौवां के जर्रा-जर्रा को अपने रक्त से कर दिया लाल

विजय बक्सरी

बलिया: देश के आजाद होने से पांच वर्ष पहले ही बलिया जनपद में वीर क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों से सीधे लोहा लिया और जनपद के हर इलाकों में बलिया के वीर सपूतों ने अंग्रजी हुकूमत के चूले हिला। जिसके परिणामस्वरुप बलिया जेल में बंद वीर क्रांतिकारी आजाद हुए और देश की आजादी के पांच वर्ष पहले ही बलिया में तिरंगा लहरा दिया गया। जिसके कारण आज भी बागी बलिया की ऐतिहासिक शान का बखान में कहा जाता है कि बलिया महज एक जनपद नहीं, क्रांतिकारी तेवर का एक अलग राष्ट्र है। 1942 के इन्हीं क्रांतिकारियों के जंग में बिल्थरारोड के सपूतों ने भी अंग्रेजों संग सीधी टक्कर ली। बेल्थरारोड की धरती के लाल भी सर पर कफन बांध अंग्रेजों के नाक में दम कर दियाा। बौखलाएं अंग्रेजों के क्रूरता का डट कर सामना करने में यहां चरौवां के चार सपूत शहीद हो गए। जबकि बिल्थरारोड में कुल सात सपूतों ने अपनी शहादत दी। जिनकी वीरता की गौरवगाथा आज भी यहां के फिजांओं में ताजा है। चरौवां गांव में स्थित ऐतिहासिक खंडहर इनकी बलिदानी दास्तां को बयां करती है। गांव में शहीदी स्मारक व बलिदानी स्पूत समेत भव्य शहीदी द्वारा के समक्ष यहां हर किसी को वीर सपूतों के शहादत पर गर्व का अहसास करता है। बिल्थरारोड डीएवी इंटर कालेज में स्थित विशाल शहीदी स्मारक भी बिल्थरारोड के क्रांतिकारी वीरों के योगदान की याद ताजा करता है। अगस्त 1942 में अंग्रेजों के आर्थिक, यातायात व संचार स्त्रोत पर सीधा हमला होने के कारण क्रांतिकारियों के प्लानिंग सेंटर के रुप में चर्चित यह क्षेत्र अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया था। जिसके बाद तो अंग्रेजों ने यहां के चरौवां गांव को ही मिटा देने का बुलेटप्रुफ प्लान बनाया और लगातार तीन दिन तक पूरे इलाके को घेर जमकर गोलियां बरसाई। बावजूद गांव के प्रत्येक बच्चा, बूढ़ा, जवान, पुरुष व महिला के एकजुटता, त्याग, बलिदान व साहस ने अंग्रेजों के होश उड़ा दिए। एक वीरांगना मकतूलिया मालीन समेत अमर शहीद चंद्रदीप सिंह निवासी ग्राम आरीपुर सरयां, अतवारु राजभर निवासी ग्राम टंगुनिया, शिवशंकर सिंह, मंगला सिंह, ग्राम चरौंवा, खर बियार ग्राम चरौवां समेत सभी छ बिल्थरारोड में अंग्रेजों के गोलीबारी में शहीद हुए। जबकि सूर्यनारायण मिश्र निवासी ग्राम मिश्रवली बिल्थरारोड उन्हीं दिनों बलिया शहर में सैनिकों की अंधाधुंध गोलबारी में शहीद हो गए। कई अंग्रेजी सिपाही मारे गए और अंग्रेजी सेना के अगुवाई कर रहे कैप्टन समेत कई फिरंगी अधिकारियों गंभीर रुप से जख्मी हुए। बिल्थरारोड का स्टेशन व मालगोदाम फूंक डाला गया। बिल्थरारोड डम्बर बाबा मेले में स्टेशन पर धावा बोलने की योजना बनी और अंजाम तक पहुंचाया गया। जिसके कारण हथियारों से लैस हो तीन दिन तक क्षेत्र में तांडव करने वाले अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा।

जब वीरांगना मकतूलिया ने अंग्रेज कैप्टन मूर के सर पर मारी हांडी, तिलमिला गए अंग्रेज

– भारत छोड़ो आंदोलन के दौर के बीच 14 अगस्त 1942 को बिल्थरारोड में अंग्रेजों ने निहत्थे क्रांतिकारियों पर जमकर गोलियां बरसाई। जिससे चंद्रदीप सिंह ग्राम आरीपुरसरयां व अतवारु राजभर ग्राम टंगुनिया शहीद हो गए किंतु अंग्रेजों को मुंहतोड़ जवाब भी मिला। अगले ही दिन 15 अगस्त को कैप्टन मूर के नेतृत्व में अंग्रेजों ने मशीनगन के साथ चरौंवा गांव को चारों तरफ सेघेर लिया और घंटों जमकर गोलियां बरसाई। जिससे श्रीखरवियार एवं शिवशंकर सिंह शहीद हो गए। इस दौरान अंग्रेजों ने गांव में जमकर लूटपाट भी की। गांव में पूरे दिन चले अंग्रेजों के आतंक से तंग श्रीमती मकतुलिया मालीन ने फिरंगी सिपाहियों के नजर से बचकर कैप्टन मूर के सर पर मिट्टी की एक विशाल हांडी दे मारी। जिससे लहूलुहान कैप्टन को देख अंग्रेज तिलमिला गए और मकतुलिया को गोलियों से छलनी कर दिया। ग्रामीणों के हिंसक विरोध से बौखलाएं अंग्रेजों ने मकतुलिया का शव भी साथ लेते गए। इस दर्द से अभी लोग उबर भी नहीं पाए थे कि 17 अगस्त को फिर अंग्रेजी फौज ने गांव में हमला बोला। जमकर गोलियां चलाई, कई घरों को फूंक दिया और घरों में लूटपाट की। इस दौरान अंग्रेजों की गोली से मंगला सिंह शहीद हो गए। आज भी यहां की लाल मिट्टी शहीद वीरों के बलिदानी गाथा को याद दिलाती है और लोगों में देश प्रेम व राष्ट्रभक्ति का जज्बां जगाती है। देश की आजादी के बाद उ.प्र. कांग्रेस कमेटी की तरफ से स्वयं स्व. फिरोज गांधी भी यहां अपने दल-बल के साथ पहुंचे और वीरों को श्रद्धांजलि दे यहां की बलिदानी मिट्टी को साथ लेते गए।

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