जरा याद करो कुर्बानी-मधुबन थाना गोली कांड

जयशंकर गुप्त

1857 के भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम या फिर करो या मरो के नारे के साथ अगस्त क्रांति के नाम से पूरी दुनिया में चर्चित ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ जनांदोलन में पूर्वी उत्तर प्रदेश और खासतौर से आजमगढ़ जिले का और उसमें भी मधुबन इलाके का योगदान बहुत महत्वपूर्ण रहा है. अभी मऊ जिले में स्थित मधुबन उस समय आजमगढ़ जिले का सबसे दूरस्थ सर्कल था. यह तत्कालीन गोरखपुर और बलिया जिलों की सीमाओं के साथ लगा अत्यंत पिछड़ा इलाका था. यहां पक्की सड़कों और रेलवे से संपर्क नहीं था (रेल संपर्क तो अब भी नहीं है). निकटतम रेलवे स्टेशन घोसी (10 मील) और बेल्थरा रोड (14 मील) था।

इस इलाके में कांग्रेस और समाजवादियों का मजबूत आधार था. मधुबन किसान आंदोलनों के कारण भी चर्चित था. भारत छोड़ो आंदोलन के तहत कांग्रेस और इसके भीतर सक्रिय समाजवादियों के नेतृत्व में 15 अगस्त 1942 को हजारों छात्र-युवा, ग्रामीण किसानों की भीड़ ने मधुबन थाने को घेर लिया था. थाने पर तिरंगा फहराने को उद्धत भीड़ पर जिला कलेक्टर आर एच निबलेट और थानेदार मुक्तेश्वर सिंह की उपस्थिति में पुलिस ने कई चक्र गोलियां चलाई. एक दर्जन से अधिक लोग मौके पर ही शहीद हो गये. दर्जनों लोग गंभीर और कुछ मामूली रूप से भी घायल हुए. लेकिन जनता तीन दिन तक थाने को घेरे रही. जिला कलेक्टर आर एच निबलेट, पुलिस के अधिकारी और जवान तीन दिनों तक थाने में ही दुम दबाकर बैठे रहे. वे लोग बाहर तभी, 17 अगस्त की रात में, निकल सके जब सदर, आजमगढ़ से फौज की टुकड़ी और अतिरिक्त पुलिस, हथियारों की खेप और रसद आ गई.

16 अगस्त को जापान रेडियो पर प्रसारित समाचार में मधुबन के लोगों की शौर्य गाथा का जिक्र करते हुए कहा गया कि हजारों की तादाद में मधुबन के बहादुर लोगों ने थाने पर कब्जा कर लिया. मधुबन थाने पर जन कार्रवाई की महत्ता को तत्कालीन जिला कलेक्टर निबलेट के इन शब्दों में भी समझ सकते हैं, “हर जगह परेशानी थी; लेकिन मुख्यतः जिले के पूर्वी हिस्से में समस्या अधिक थी. मधुबन के पुलिस हलके में नागरिक प्रशासन पूरी तरह से बाधित था और पुलिस अपने मुख्यालय की सीमाओं से परे निकल कर कार्य नहीं कर सकती थी.” निबलेट की निगाह में मधुबन की लड़ाई ब्रिटेश साम्राज्य के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में लड़े जा रहे युद्धों की तुलना में किसी से कम नहीं थी. तत्कालीन वायसराय लिनलिथगो ने अपने नोटिंग में बताया कि मधुबन की घटना के बारे में निबलेट से मिले विवरण ने उन्हें 1857 की याद दिला दी.मधुबन के शहीद, स्वतंत्रता सेनानियों की याद में वहां शहीद इंटर कालेज मधुबन बना और आजादी के बाद ‘शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले’ की तर्ज पर मधुबन, अस्पताल वाली बाग (अब बाग तो रहा नहीं) में हर साल 15 अगस्त को शहीद मेला लगता रहा।

चौरी चौरा और मधुबन थाना कांड

लेकिन यह अफसोस की बात है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मधुबन का इतना बड़ा और अभूतपूर्व योगदान राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर भी अचर्चित सा रहा. उसे वैसी प्रसिद्धि और ख्याति नहीं मिल सकी जैसी प्रसिद्धि बलिया की घटना और गोरखपुर के चौरी चौरा कांड को मिली. चौरी चौरा और मधुबन थानाकांडों में मूलभूत फर्क यह था कि गोरखपुर के पास चौरी चौरा में 5 फ़रवरी 1922 को असहयोग आंदोलन के क्रम में आंदोलनकारियों ने पुलिस चौकी को आग लगा दी थी जिससे उसमें छुपे हुए 22 पुलिस कर्मचारी जिन्दा जलकर मर गए थे. इससे दुखी होकर गांधीजी ने यह कहते हुए असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था कि अब यह आंदोलन अहिंसक नहीं रह गया है.इसके उलट मधुबन में थाने का घेराव कर वहां तिरंगा फहराने की कोशिश में जमा हजारों लोगों की अहिंसक भीड़ पर पुलिस ने गोलियां बरसाई थीं.

लेखक देशबन्धु के एक्जीक्यूटिव एडिटर और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य है .

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